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Gulzar & Jagjit singh : Marasim

मरासिम : सम्बन्ध 

शाम से आँख में नमी सी है 
आज फिर आपकी कमी सी है 

दफ़न कर दो हमें कि सांस मिले 
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है 

वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर 
इसकी आदत भी आदमी सी है 

कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी 
एक तसलीम लाज़मी सी है 

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हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते 
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते 

जिसकी आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन 
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते 

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा-थोड़ा 
जाने वालों के दिल नहीं थोड़ा करते 

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो 
ऐसे दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते 

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दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई,
जैसे अहसाँ उतारता है कोई 

आईना देखकर तसल्ली हुई, 
हमको इस घर में जानता है कोई 

पक गया है शजर पे फल शायद,
फिर से पत्थर उछालता है कोई

देर से गूंजते है सन्नाटे,
जैसे हमको पुकारता है कोई 

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ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तनहा 
काफ़िला साथ और सफर तनहा 

अपने साये से चौंक जाते हैं 
उम्र गुज़री है इस कदर तनहा 

रात भर बोलते हैं सन्नाटे 
रात काटे कोई किधर तनहा 

दिन गुजरता नहीं है लोगों में 
रात होती नहीं बसर तनहा 

हमने दरवाज़े तक तो देखा था 
फिर न जाने गए किधर तनहा 

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एक पुराना मौसम लौटा, याद भरी पुरवाई भी 
ऐसा तो कम ही होता है, वो भी हो तन्हाई भी 

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं 
कितनी सौंधी लगती है माज़ी की रुसवाई भी 

दो दो शक्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में 
मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी 

ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी है 
उनकी बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी 

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आँखों में जल रहा है क्यूँ, बुझता नहीं है धुआँ 
उठता तो है घटा सा, बरसता नहीं धुँआ 

चूल्हे नहीं जलाये, या बस्ती भी जल गई 
कुछ रोज़ हो गए हैं अब, उठता नहीं धुँआ 

आँखों के पोंछने से लगा आंच का पता 
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुँआ 

आँखों से आंसुओं के मरासिम पुराने हैं 
मेहमाँ ये घर में आये तो चुभता नहीं धुँआ 

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All Lyrics By Gulzar.