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Gulzar & Jagjit : Koi baat chale

Naration by Gulzar Saab :

आदमी बुलबुला है पानी का और पानी की बहती सतह पर
टूटता है डूबता भी है फिर उभरता है फिर से बहता है
ना समंदर निगल सका है इसको न तवारीख तोड़ पायी है
वक़्त की मौज पर सदा बहता आदमी बुलबुला है पानी का

ghazal :

ज़िन्दगी क्या है जानने के लिए
ज़िंदा रहना बहुत जरुरी है
आज तक कोई भी रहा तो नहीं

सारी वादी उदास बैठी है
मौसम-ए गुल ने ख़ुदकुशी कर ली 
किसने बारूद बोया बाग़ों में 

आओ हम सब पहन लें आइना 
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा 
सबको सारे हसीं लगेंगे यहाँ 

है नहीं जो दिखाई देता है 
आईने पर छपा हुआ चेहरा 
तर्जुमा आइने का ठीक नहीं 

हमको ग़ालिब ने ये दुआ दी थी 
तुम सलामत रहो हज़ार बरस 
ये बरस तो फ़क़त दिनों में गया 

लब तेरे मीर ने भी देखे है 
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है 
बात सुनते तो ग़ालिब हो जाते 

ऐसे बिखरे हैं रात दिन जैसे 
मोतियों वाला हार टूट गया 
तुमने मुझको पिरोके रखा था 

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नज़र उठाओ जरा तुम तो कायनात चले 
है इंतज़ार कि आँखों से कोई बात चले 

तुम्हारी मर्ज़ी बिना वक़्त भी अपाहज है 
ना दिन खिसकता है आगे ना आगे रात चले 

ना जाने उंगली छुड़ा के निकल गया है किधर 
बहुत कहा था ज़माने से साथ साथ चले 

किसी भिखारी का टूटा हुआ कटोरा है 
गले में डाले उसे आसमाँ पे रात चले 

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है लौ ज़िन्दगी, ज़िन्दगी नूर है
मगर इसमें जलने का दस्तूर है

कभी सामने आता मिलते उसे
बड़ा नाम उसका है, मशहूर है

भंवर पास है चल पहन ले इसे
किनारे का फंदा बहुत दूर है

सुना है वही करने वाला है सब 
सुना है कि इंसान मजबूर है 

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" शाम से सांस भारी है, बेक़रारी है बेक़रारी है 
  आपके बाद हर घडी हमने आपके साथ ही गुजारी है  "  naration by gulzar saab

सहमा सहमा डरा सा रहता है 
जाने क्यों जी भरा सा रहता है 

इश्क़ में और कुछ नहीं होता 
आदमी बावरा सा रहता है 

एक पल देख लूँ तो उठता हूँ 
जल गया सब जरा सा रहता है 

चाँद जब आसमान पे आ जाये 
आपका आसरा सा रहता है 

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" याद है इक दिन मेरे मेज पे बैठ बैठे,
 सिगरेट की डिबिया पर तुमने 
 एक छोटे से पौधे का स्कैच बनाया था 
 आकर देखो, उस पौधे पर फूल आया है "  Naration by Gulzar Saab

आप गर इन दिनों यहाँ होते 
हम ज़मीं पर भला कहाँ होते 

वक़्त गुजरा नहीं अभी वर्ना 
रेत पर पाँव के निशां होते 

मेरे आगे नहीं था गर कोई 
मेरे पीछे तो कारवां होते 

तेरे साहिल पर लौट कर आती 
गर उम्मीदों के बादबाँ होते 

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फूलों की तरह लब खोल कभी 
खुशबू की जुबां में बोल कभी 

अल्फ़ाज़ परखता रहता है 
आवाज़ हमारी तोल कभी 

खिड़की में कटी है सब रातें 
कुछ चौरस और कुछ गोल कभी 

ये दिल भी दोस्त ज़मीं की तरह 
हो जाता है डांवाडोल कभी 

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त्रिवेणी : ( ये दो लाइन के शेर न होकर तीन लाइन की त्रिवेणियाँ हैं जिसका अविष्कार गुलज़ार साब ने किया है )

तेरी सूरत जो भरी रहती है, आँखों में सदा 
अजनबी लोग भी पहचाने से लगते हैं मुझे 

तेरे रिश्तों में तो, दुनिया ही पिरो ली मैंने 



एक से घर है सभी, एक से है बाशिंदे 
अजनबी शहर में कुछ अजनबी लगता ही नहीं 

एक से दर्द हैं, सब एक से ही रिश्ते हैं 


उम्र के खेल में. इकतरफा है ये रस्साकशी 
इक सिरा मुझको दिया होता तो कुछ बात भी थी 

मुझसे तगड़ा भी है और सामने आता भी नहीं 



सामने आये मेरे, देखा मुझे, बात भी की 
मुस्कुराये भी पुराने किसी रिश्ते के लिए 

कल का अख़बार था, बस देख लिया रख भी दिया 



वो मेरे साथ ही था दूर तक, मगर इक दिन 
मुड़ के जो देखा तो और मेरे साथ न था 

जेब फट जाए तो, कुछ सिक्के भी खो जाते हैं 



चौदवें चाँद को फिर आग लगी है देखो 
फिर बहुत देर तलक आज उजाला होगा 

राख हो जायेगा, जब फिर से अमावस होगी 

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