Come Alive By Jagjit Singh


कौन कहता है मुहब्बत की जुबाँ होती है 
ये हक़ीकत तो निगाहों से बयां होती है 

वो न आये तो सताती है ख़लिश सी दिल को 
वो जो आये तो ख़लिश और जवां होती है 

रूह को शाद करे, दिल को पुरनूर करे 
हर नज़ारे में ये तनवीर कहाँ होती है 

ज़िन्दगी इक सुलगती सी चिता है ' साहिर '
शोला बनती है न ये बुझके धुआं होती है 

                                         साहिर होशियारपुरी



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हरसू दिखाई देते हैं वो जलवागर मुझे 
क्या क्या फरेब देती है मेरी नज़र मुझे 

डाला है बेखुदी ने अजब राह पर मुझे 
आँखें है, और कुछ नहीं आता है नज़र मुझे 

दिल लेके मुझसे देते हो दाग-ऐ-जिगर मुझे 
ये बात भूलने की नहीं उम्र भर मुझे 

आया ना रास नाला-ऐ-दिल का असर मुझे 
अब तुम मिले तो कुछ नहीं अपनी खबर मुझे 

                                  जिगर मुरादाबादी

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कोई पास आया सवेरे सवेरे 
मुझे आजमाया सवेरे सवेरे 

मेरी दास्ताँ को जरा सा बदलकर 
मुझे ही सुनाया सवेरे सवेरे 

जो कहता था कल शब् सम्भलना सम्भलना 
वही लड़खड़ाया सवेरे सवेरे 

कटी रात सारी मेरी मैकदे में 
ख़ुदा याद आया सवेरे सवेरे 

जली थी शमा रात भर जिसकी खातिर 
उसीको जलाया सवेरे सवेरे 

                                                 सईद राही

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मेरी तन्हाइयों तुम ही लगा लो मुझको सीने से 
कि मैं घबरा गया हूँ इस तरह रो रो के जीने से 

ये आधी रात को फिर चूड़ियां सी क्या खनकती है 
कोई आता है या मेरी ही जंजीरें खनकती है 
ये बातें किस तरह पूछूं मैं सावन के महीने से 

पीने दो मुझे अपने ही लहू का जाम पीने दो 
ना सीने दो किसी को भी मेरा दामन ना सीने दो 
मेरी वहशत न बढ़ जाए कहीं दामन के सीने से 

                                                  prem warbartoni

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