शायरी और ग़ज़ल जब से शुरू हुई है तब से दर्शन ( philosophy ), प्रेम, ग़म, मेहबूब, प्रकृति, फूल-पेड़, चाँद तारे, आसमान, हयात इत्यादि विषयों से ही लबरेज़ रही है। दुनिया भर की असंख्य किताबें प्यार मोहब्बत और हयात की बात करती हुई उपलब्ध हो जाएँगी।मीर, ग़ालिब से लेकर गुलज़ार तक कठिन या आरामजनक शब्दों में लोगों के दिलों पे राज करने वाली अनगिनत शेरो शायरी उपलब्ध है। शायरी की सबसे बड़ी सफलता यही होती है कि सुनने वाले अपने हिसाब से इसका मज़मून निकालते हैं और वो सबको सहलाती है।
लेकिन एक शायर ऐसा भी है जिसने फूल, तारे, प्रेम इत्यादि को छोड़कर अपनी शायरी में माँ को केंद्र में रखा और सारी कायनात का प्यार उस पर बरस पड़ा। कौन इंसान है जो अपनी माँ को प्यार न करता हो और इस शायर ने सारी दुनिया के लोगों की भावनाओं को अपने शेरों में उंडेल दिया। मानवता को माँ से लिपटकर प्यार जताने के अलावा उसके सजदे में कहने के लिए शब्द मिल गए। इस शायर का एक एक शेर इंसानियत के लिए तोहफा है और माँ के प्यार को समर्पित ये शायर हैं " मुनव्वर राना " । नजराना पेश है :-
लबों पे उसके कभी बददुआ नहीं होती
बस इक माँ है जो कभी ख़फा नहीं होती
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है
ऐ अँधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दी घर में उजाला हो गया
अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है
ये ऐसा कर्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर ना लौटूं मेरी माँ सजदे में रहती है
लबों पे उसके कभी बददुआ नहीं होती
बस इक माँ है जो कभी ख़फा नहीं होती
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है
ऐ अँधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दी घर में उजाला हो गया
अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है
ये ऐसा कर्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर ना लौटूं मेरी माँ सजदे में रहती है
' मुनव्वर ' माँ के आगे यूँ कभी खुलकर मत रोना
जहाँ बुनियाद हो वहाँ इतनी नमी अच्छी नहीं होती
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