प्यार…एक जादुई शब्द… दुनिया के अस्तित्व का आधार.... ढाई अक्षर का वो खुदाई कारनामा, जिसके बिना दुनिया एक पल भी नहीं आगे बढ़ सकती …प्रकृति का कायनात से, खुदा का अपने बन्दों से, माँ पिता का संतान से, पति पत्नी, भाई बहन का प्यार... प्यार ही हमारे जीवन का सबसे बड़ा स्तम्भ है, आप किसी से भी प्यार न करें परन्तु अपने जीवन से तो करते ही है, जिसको जीवन से नहीं उसे मौत से प्यार है…जीवन में भी अपनी इज्जत से प्यार, अहम् से प्यार और ये नहीं तो वैराग्य से प्यार... संगठन से नहीं तो अकेलेपन से प्यार.... परन्तु सच ये है प्यार तो हर सांस में व्याप्त है ही...
हमारी हिंदी फिल्मों में प्यार एक तरफ है, बाकी सारे तत्त्व दूसरी तरफ़…सच तो ये है कि इन फिल्मों ने प्यार करने वालो को एक जुबान दी है…क्युकि अवाम का जो जुड़ाव फिल्मों से है वो किसी से भी नहीं.... और गाने, वो तो साहब हिंदी फिल्मों की आत्मा है…किसी फ़िल्म का सीन आप भूल जायेंगे परन्तु गाने सदियों तक अमर होते है…आप समझ गए में फिल्मों में प्यार के गानो की ही बात करूँगा.... ये अलग बात है कि दौर बदलने के साथ इसका रूप बदलता गया... फिल्मों के शुरूआती दौर में प्यार को न निभा पाने के डर की वजह से नायक कहता है " प्यार हुआ इक़रार हुआ है प्यार से फिर क्यों डरता है दिल…" वही एक जगह नायक अनुरोध करता है कि " एहसान तेरा होगा मुझ पर, दिल चाहता है वो कहने दो, मुझे तुमसे मुहब्बत हो गई है मुझे पलकों कि छांव में रहने दो…" आप प्यार कि पाक़ीज़गी देखिये कि कोई न निभाने से डर रहा है तो कोई प्यार के लिए अनुरोध कर रहा है… एक जगह नायक को नायिका में रब दिखने लगता है… " तुझमे में रब दिखता है यारा में क्या करूँ "
मेरे हिसाब से हर इंसान इस दौर से गुजरता है जिसमे उसे अपने यार में रब दिखता है... वो प्यार ही क्या जिसमे मेहबूब अपने यार का सजदा न करे… बदलते दौर में रूपक भी बदलते गए.... एक गाना जो कालांतर में प्रेम का मुहर गीत बन गया " पहला नशा पहला खुमार, नया प्यार है नया इंतज़ार "
यहाँ युवा को प्यार नशा लगने लगा... कहीं ये दीवानगी जताने लगा, " तुझे देखा तो ये जाना सनम, प्यार होता है दीवाना सनम " यहाँ से आशिक़ी, दीवानगी में तब्दील होने लगी.... फिर तो इश्क़ कमीना भी होने लगा…जुमले बनने लगे, " इश्क़ चांदी है, इश्क़ सोना है "… हद तो ये भी लगती है कि इश्क़ वाला लव, फ़्लर्ट वाला लव अलग- अलग होने लगे , और शायद जरुरत वाला लव भी.... अब सांस्कृतिक बदलाव कहें या रुचियों का फर्क य़ा फिर फिल्मों की जुबान में परिवर्तन.... प्यार चाइना का माल भी बन गया है, जिसकी कोई गारंटी नहीं....शब्दों का इस स्तर पर आना वह भी प्यार के लिए, थोडा विचलित करता है.... क्युकि जिस रूपक का प्रयोग यहाँ हुआ है उसका मतलब हिंदुस्तान में किसी से छिपा नहीं है....यह भाषा में गिरावट का भी प्रतीक है....लेकिन कुछ लोग कहते है कि युवा इस तरह कि भाषा पसंद कर रहे है...खैर में यहाँ अच्छे बुरे का विश्लेषण नहीं करूंगा...
ये तय है कि इश्क़ समंदर हो या प्यार का पर्वत.... ये हमारे गानों का स्थायी भाव है… बीच बीच में गुलज़ार, जावेद अख्तर, प्रसून जोशी, इरशाद कामिल, सयेद क़ादरी जैसे गीतकार हमें स्वर्ण युग में ले जाते है और उम्मीद कायम रखते है कि कविता, शायरी, संवेदना हमारे गीतों में से कही नहीं जाने वाली... एक गाने के बीच बोल मुझे बड़े प्रिय है, देखे ज़रा ,,
" आ नींद का सौदा करें, इक ख्वाब ले इक ख्वाब दे
इक ख्वाब तो आँखों में है, इक चाँद के तकिये तले
कितने दिनों से ये आसमां भी सोया नहीं, आज इसको सुला दें "
आज इतना ही, तब तक जय जय......
" श्री लाल राठी "
हमारी हिंदी फिल्मों में प्यार एक तरफ है, बाकी सारे तत्त्व दूसरी तरफ़…सच तो ये है कि इन फिल्मों ने प्यार करने वालो को एक जुबान दी है…क्युकि अवाम का जो जुड़ाव फिल्मों से है वो किसी से भी नहीं.... और गाने, वो तो साहब हिंदी फिल्मों की आत्मा है…किसी फ़िल्म का सीन आप भूल जायेंगे परन्तु गाने सदियों तक अमर होते है…आप समझ गए में फिल्मों में प्यार के गानो की ही बात करूँगा.... ये अलग बात है कि दौर बदलने के साथ इसका रूप बदलता गया... फिल्मों के शुरूआती दौर में प्यार को न निभा पाने के डर की वजह से नायक कहता है " प्यार हुआ इक़रार हुआ है प्यार से फिर क्यों डरता है दिल…" वही एक जगह नायक अनुरोध करता है कि " एहसान तेरा होगा मुझ पर, दिल चाहता है वो कहने दो, मुझे तुमसे मुहब्बत हो गई है मुझे पलकों कि छांव में रहने दो…" आप प्यार कि पाक़ीज़गी देखिये कि कोई न निभाने से डर रहा है तो कोई प्यार के लिए अनुरोध कर रहा है… एक जगह नायक को नायिका में रब दिखने लगता है… " तुझमे में रब दिखता है यारा में क्या करूँ "
मेरे हिसाब से हर इंसान इस दौर से गुजरता है जिसमे उसे अपने यार में रब दिखता है... वो प्यार ही क्या जिसमे मेहबूब अपने यार का सजदा न करे… बदलते दौर में रूपक भी बदलते गए.... एक गाना जो कालांतर में प्रेम का मुहर गीत बन गया " पहला नशा पहला खुमार, नया प्यार है नया इंतज़ार "
यहाँ युवा को प्यार नशा लगने लगा... कहीं ये दीवानगी जताने लगा, " तुझे देखा तो ये जाना सनम, प्यार होता है दीवाना सनम " यहाँ से आशिक़ी, दीवानगी में तब्दील होने लगी.... फिर तो इश्क़ कमीना भी होने लगा…जुमले बनने लगे, " इश्क़ चांदी है, इश्क़ सोना है "… हद तो ये भी लगती है कि इश्क़ वाला लव, फ़्लर्ट वाला लव अलग- अलग होने लगे , और शायद जरुरत वाला लव भी.... अब सांस्कृतिक बदलाव कहें या रुचियों का फर्क य़ा फिर फिल्मों की जुबान में परिवर्तन.... प्यार चाइना का माल भी बन गया है, जिसकी कोई गारंटी नहीं....शब्दों का इस स्तर पर आना वह भी प्यार के लिए, थोडा विचलित करता है.... क्युकि जिस रूपक का प्रयोग यहाँ हुआ है उसका मतलब हिंदुस्तान में किसी से छिपा नहीं है....यह भाषा में गिरावट का भी प्रतीक है....लेकिन कुछ लोग कहते है कि युवा इस तरह कि भाषा पसंद कर रहे है...खैर में यहाँ अच्छे बुरे का विश्लेषण नहीं करूंगा...
ये तय है कि इश्क़ समंदर हो या प्यार का पर्वत.... ये हमारे गानों का स्थायी भाव है… बीच बीच में गुलज़ार, जावेद अख्तर, प्रसून जोशी, इरशाद कामिल, सयेद क़ादरी जैसे गीतकार हमें स्वर्ण युग में ले जाते है और उम्मीद कायम रखते है कि कविता, शायरी, संवेदना हमारे गीतों में से कही नहीं जाने वाली... एक गाने के बीच बोल मुझे बड़े प्रिय है, देखे ज़रा ,,
" आ नींद का सौदा करें, इक ख्वाब ले इक ख्वाब दे
इक ख्वाब तो आँखों में है, इक चाँद के तकिये तले
कितने दिनों से ये आसमां भी सोया नहीं, आज इसको सुला दें "
आज इतना ही, तब तक जय जय......
" श्री लाल राठी "
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